Frequently Asked Questions
FAQ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मुफ्त कानूनी सहायता, रिट और याचिका, तथा उपभोक्ता न्यायालय से जुड़े सामान्य प्रश्नों के उत्तर।
Ask us directlyहाँ, फ्री लीगल सर्विसेज के तहत अपनी पसंद के वकील की सेवाओं का लाभ उठाना संभव है। National Legal Services Authority (Free and Competent Legal Services) Regulations 2010 के रेगुलेशन 7(6) के अनुसार, लीगल सर्विस के लिए एप्लीकेशन की स्क्रूटिनी Member-Secretary या Secretary द्वारा की जाएगी और यदि एप्लिकेंट ने अपने एप्लीकेशन में अपने चुने हुए वकील का उल्लेख किया है तो Member-Secretary और The Secretary उस पर विचार कर सकते हैं।
Section 13(1) of Legal Services Authority Act, 1987 के अनुसार कोई भी व्यक्ति जो Section 12 के तहत किसी भी क्राइटेरिया को संतुष्ट करता है, वो लीगल सर्विस प्राप्त करने का हक़दार है, पर The Concerned Legal Services Authority संतुष्ट हो कि ऐसे व्यक्ति के पास ईमानदार केस हो मुकदमा चलाने या बचाव करने के लिए। इसलिए इस बात पर कोई रोक नहीं है कि किस तरह के केस में आवेदन कर सकते हैं। सभी प्रकार के केस शामिल हैं जब तक एक Individual Section 12 के अनुसार Eligibility Criteria को संतुष्ट करता है।
मुफ्त कानूनी सेवाओं में शामिल हैं: 1. कानूनी कार्यवाही में एक वकील द्वारा प्रतिनिधित्व। 2. किसी भी कानूनी कार्यवाही के संबंध में गवाहों को बुलाने का खर्च या कोई भी अन्य प्रक्रिया शुल्क का भुगतान। 3. कानूनी कार्यवाही में दस्तावेजों की छपाई और दस्तावेजों का अनुवाद, मेमो ऑफ अपील या पेपर बुक तैयार करना। 4. कानूनी दस्तावेजों का मसौदा तैयार करना, विशेष अनुमति याचिका आदि। 5. कानूनी कार्यवाहियों में निर्णयों, आदेशों, सबूतों के नोट्स और अन्य दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियों की आपूर्ति।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (निःशुल्क और सक्षम कानूनी सेवाएं) विनियम 2010 के विनियम 7(2) के अनुसार, मुफ्त कानूनी सहायता के लिए आवेदन पर तत्काल निर्णय लिया जाना चाहिए और इस निर्णय में 7 दिन से अधिक का वक्त नहीं लगना चाहिए। ये 7 दिन आवेदन प्राप्त होने की तारीख से गिने जाएंगे।
कानूनी सहायता के लिए आवेदन स्वीकार करने से पहले प्रारंभिक चरण में कानूनी सहायता से इनकार किया जा सकता है। आवेदन स्वीकार किए जाने और कानूनी सहायता प्रदान किए जाने के बाद इसे बाद के चरण में भी वापस लिया जा सकता है।
निम्नलिखित परिस्थितियों में कानूनी सहायता से इनकार या वापस लिया जा सकता है: (a) यदि कोई व्यक्ति कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत अपात्र पाया जाता है। (b) यदि सहायता प्राप्त व्यक्ति जिसने आय वर्ग के तहत आवेदन किया है, उसके पास पर्याप्त साधन हैं। (c) जहां सहायता प्राप्त व्यक्ति ने गलत बयानी या धोखाधड़ी से कानूनी सेवाएं प्राप्त की हों। (d) जहां सहायता प्राप्त व्यक्ति कानूनी सेवा प्राधिकरण/समिति या कानूनी सेवा अधिवक्ता के साथ सहयोग नहीं करता है। (e) जहां व्यक्ति कानूनी सेवा प्राधिकरण/समिति द्वारा सौंपे गए व्यक्ति के अलावा किसी अन्य विधि व्यवसायी को नियुक्त करता है। (f) सहायता प्राप्त व्यक्ति की मृत्यु की स्थिति में, सिवाय सिविल कार्यवाही के जहां अधिकार या दायित्व जीवित रहता है। (g) जहां कानूनी सेवा के लिए आवेदन या विचाराधीन मामला कानून की प्रक्रिया या कानूनी सेवाओं का दुरुपयोग पाया जाता है।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (निःशुल्क और सक्षम कानूनी सेवाएं) विनियम 2010 के विनियम 7(5) के अनुसार, कानूनी सेवाओं के लिए आवेदन की जांच सदस्य-सचिव द्वारा की जाएगी और यदि कोई व्यक्ति उनके निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो कार्यपालक कानूनी सेवा संस्थान के अध्यक्ष के पास अपील कर सकता है और उनका फैसला अंतिम होगा।
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों रिट जारी कर सकते हैं। मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 32 के तहत विभिन्न रूपों की रिट जारी करने का अधिकार है, और उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के तहत।
दोनों में एक बड़ा अंतर यह है कि रिट अनुच्छेद 226 के तहत सभी लोगों के लिए संवैधानिक उपचार है। यह एक कानूनी प्राधिकरण द्वारा शुरू किया जाता है। लेकिन याचिका लोगों द्वारा उठाई गई रिट का एक रूप है, एक कानूनी प्राधिकरण के लिए जो किसी विशेष कारण के बारे में कार्रवाई करना चाहता है।
जी हां। निर्भया केस के बाद 2013 में क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट पास किया गया, जिससे स्टॉकिंग जैसे मामलों को भी क्रिमिनल ऑफेंस माना गया। अगर एक आदमी एक औरत का पीछा करता है तो उसे 3 साल तक की जेल हो सकती है और अगर वो रिपीट ऑफेंडर है तो 5 साल तक की जेल हो सकती है। एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार 2021 में पीछा करने के कुल 9,285 मामले दर्ज किए गए, जो हर घंटे लगभग एक मामला और एक दिन में लगभग 25 मामले हैं। इसके बाद भी पीछा करना एक जमानती अपराध है।
1. एक उपभोक्ता — 'उपभोक्ता' वो है जो ये शर्तें पूरी करता है: व्यक्ति ने कुछ पैसों के बदले में सामान खरीदा हो या कुछ सर्विसेज का लाभ उठाया हो; व्यक्ति ने पर्सनल यूज़ के लिए गुड्स खरीदा हो, न कि दोबारा बेचने या व्यापारिक उद्देश्य के लिए; स्वैच्छिक उपभोक्ता संघ — कंपनी अधिनियम, 1956/2013 के तहत या किसी अन्य कानून के अंतर्गत पंजीकृत संघ। 2. केंद्र या राज्य सरकार। 3. एक या अधिक उपभोक्ता जिनका समान हित है। 4. किसी उपभोक्ता की मृत्यु हो जाने पर उसका कानूनी उत्तराधिकारी या प्रतिनिधि।
शिकायत एक उपभोक्ता या उसका कानूनी वारिस या प्रतिनिधि या स्वैच्छिक उपभोक्ता संघ कर सकते हैं, अगर दोनों में से कोई भी स्थिति संतुष्ट होती है: कार्रवाई की तारीख को 2 साल बीते न हों; और शिकायतकर्ता में शिकायत फ़ाइल करने की कानूनी क्षमता होनी चाहिए, यानी समझदार, सॉल्वेंट और मेजर।
सेवा प्रदाता द्वारा अनुचित व्यापार व्यवहार या प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अपनाना; दोषपूर्ण सामान जो शिकायतकर्ता द्वारा पहले ही खरीदा गया हो या खरीदने के लिए सहमति हो; सेवाओं में कमी, चाहे किराए पर ली गई हो या लेने के लिए सहमति हो; जो प्राइस कानून ने फिक्स किया है या जो पैकेजिंग पर डिस्प्ले होता है या जो पार्टियों के बीच फिक्स हुआ हो, उससे ज़्यादा लेना; खतरनाक सामान या सेवाओं को बेचना या बेचने के लिए ऑफर करना जो जीवन के लिए खतरा हों और ट्रेडर को ये पता हो।
कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत त्रिस्तरीय शिकायत निवारण फोरम के लिए मौद्रिक सीमा तय है। डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल फोरम (DCDRF) — क्लेम की वैल्यू 20 लाख या उससे कम। स्टेट कमीशन — क्लेम की वैल्यू 20 लाख से 1 करोड़ के बीच। नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) — क्लेम की वैल्यू 1 करोड़ से ज़्यादा। अगर कोई NCDRC के फैसले से व्यथित है तो वो सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
सर्विस या गुड्स प्रोवाइडर को पीड़ित पक्ष को नोटिस देना होगा। अगर पार्टी मुआवजा देने के लिए मान जाती है तो ठीक, वरना औपचारिक उपभोक्ता शिकायत फाइल करनी होगी। शिकायत के साथ संबंधित दस्तावेज संलग्न करने होंगे। मौद्रिक सीमा के अनुसार उपयुक्त मंच का चयन करना होगा। कोर्ट की निर्धारित फीस देनी होगी। पीड़ित पक्ष को कंज्यूमर कोर्ट में एफिडेविट भी सबमिट करना होगा।
पीड़ित पक्ष को शिकायत ड्राफ्ट करके नोटरीकृत करानी होगी और उसके बाद या तो खुद या किसी अधिकृत एजेंट के माध्यम से उपभोक्ता अदालत में शिकायत फ़ाइल करनी होगी। साथ ही कोर्ट फीस भी जमा करनी होगी — 1 लाख तक के मामलों में अंत्योदय अन्न योजना कार्ड धारकों के लिए छूट है और अन्य सभी मामलों में कोर्ट फीस ₹100 होगी। अगर suit की कीमत 5 लाख तक है तो कोर्ट फीस ₹200, 10 लाख तक है तो ₹400, और 20 लाख तक है तो ₹500 होगी।
Consult With Us